दर्द के फूल भी खिलते है , बिखर जाते है
जख्म कैसे भी हो , कुछ दिन में भर जाते है...
उस दरीचे मे भी अब कोई नहीं , और हम भी
सर झुकाए हुए , चुप चाप चले जाते है...
रास्ते रोके खड़ी है , यही उलझन कब से
कोई पूछे तो कहे क्या , की किधर जाते है...
नर्म आवाज , भली बाते, मह्ज्ज़ब लहजे
पहली बारीश मे , ये रंग उतर जाते है...!
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